डीएपी आयात के लिए 30 फीसदी ज्यादा दाम पर हुए सौदे, बढ़ेगा उर्वरक सब्सिडी का बोझ

डीएपी के आयात सौदे 920 से 930 डॉलर प्रति टन के भाव पर हुए हैं। ईरान युद्ध शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी के भाव 720 से 730 डॉलर के आसपास थे। इस तरह नए सौदे लगभग एक-तिहाई महंगे हुए हैं

डीएपी आयात के लिए 30 फीसदी ज्यादा दाम पर हुए सौदे, बढ़ेगा उर्वरक सब्सिडी का बोझ

पश्चिमी एशिया संकट के बीच भारतीय कंपनियों ने खरीफ सीजन के लिए 15 लाख टन डाइअमोनियम फॉस्फेट (DAP) के आयात के सौदे किए हैं। उर्वरकों की कीमतों और आपूर्ति पर पिछले ढाई माह से जारी अमेरिका-ईरान युद्ध का साफ असर दिख रहा है। युद्ध के पहले फरवरी में जहां डीएपी की वैश्विक कीमत 720 से 730 डॉलर प्रति टन के आसपास थी, वहीं भारत द्वारा मंजूर किए गये टेंडरों में पश्चिमी और पूर्वी तट के लिए 920 व 930 डॉलर प्रति के सौदे हुए हैं।

उद्योग सूत्रों के मुताबिक, उर्वरक निर्यातकों ने 920 से 1000 डॉलर प्रति टन की कीमत पर डीएपी आपूर्ति की पेशकश की थी। इसके पहले सरकार ने 935 और 959 डॉलर प्रति टन की कीमत पर 25 लाख टन यूरिया आयात के सौदे किए थे। महंगे आयात के चलते इस साल उर्वरक सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी होना तय है। उल्लेखनीय है कि युद्ध के पहले यूरिया का आयात 435 डॉलर प्रति टन की कीमत पर किया जा रहा था।

मिली जानकारी के अनुसार, डीएपी आयात के सौदे में दुनिया के दो बड़े निर्यातक मोरक्को की कंपनी ओसीपी और चीन शामिल नहीं रहे हैं और कई अन्य स्रोतों से यह सौदे किये गये हैं। उद्योग सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि चीन अभी डीएपी का निर्यात नहीं कर रहा है। वहीं दुनिया के सबसे बड़े रॉक फॉस्फेट रिजर्व वाले देश मोरक्को में भी डीएपी का उत्पादन नहीं हो पा रहा है क्योंकि खाड़ी युद्ध के चलते उसे सल्फर नहीं मिल पा रहा है। डीएपी उत्पादन के लिए सल्फयूरिक एसिड की जरूरत पड़ती है।

दो दिन पहले भारत सरकार ने बताया था कि देश में 199.65 लाख टन उर्वरकों का भंडार है जो एक साल पहले 178.58 लाख टन था। मौजूदा भंडार में 76.65 लाख टन यूरिया, 22.52 लाख टन डीएपी, 60.42 लाख टन एनपीके, 26.99 लाख टन सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) और 13.07 लाख टन म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) है। सरकार ने पूरे खरीफ सीजन में 390.54 लाख टन उर्वरक खपत का अनुमान लगाया है। 

ईरान युद्ध के कारण उर्वरकों के घरेलू उत्पादन में भी गिरावट आई है। पिछले साल 1 मार्च से 10 मई तक देश में कुल 92.01 लाख टन उर्वरकों का उत्पादन हुआ था, जो इस साल इस अवधि में घटकर 76.78 लाख टन रह गया है। यूरिया उत्पादन 54.98 लाख टन की तुलना में 46.28 लाख टन, डीएपी 5.56 लाख टन की तुलना में 6.20 लाख टन, एनपीके 22.03 लाख टन की तुलना में 15.57 लाख टन और एसएसपी 9.44 लाख टन की तुलना में 8.73 लाख टन रहा है।

घरेलू स्तर पर यूरिया और डीएपी व कॉम्प्लेक्स उर्वरकों (एनपीके) के उत्पादन में अमोनिया की उपलब्धता में कमी एक बड़ी बाधा बन रहा है। देश में उर्वरकों के सबसे अहम कच्चे माल एलएनजी का आयात कम हो रहा है। सबसे अधिक एलएनजी का आयात कतर से होता रहा है लेकिन युद्ध के चलते खाड़ी देशों से एलएनजी का आयात न के बराबर रह गया है और उसका उत्पादन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में तैयार उर्वरकों का आयात उपलब्धता की स्थिति को बेहतर करेगा।

वहीं, उर्वरक संकट का असर जमीनी स्तर पर भी दिखने लगा है। हालांकि बढ़ती सब्सिडी और महंगे आयात के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग घटाने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी है। लेकिन इसका कितना असर होगा, अभी कहना मुश्किल है।

विभिन्न राज्यों से इस तरह की खबरें आने लगी हैं कि किसानों को यूरिया की बिक्री सीमित की जा रही है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के किसान रामकुमार ने रूरल वॉयस को बताया कि खाद बिक्री केंद्रों पर यूरिया के केवल दो बारे की दिए जा रहे हैं जो खपत के हिसाब से नाकाफी है। इस समय गन्ने की फसल में यूरिया का अधिक इस्तेमाल होता है। एक माह के भीतर खरीफ की मुख्य फसल धान के लिए भी उर्वरकों की मांग में तेजी आएगी। ऐसे में यूरिया की बिक्री सीमित होने से किसानों के सामने परेशानी खड़ी हो सकती है। 

पिछले दिनों हुई अधिकारप्राप्त सचिवों की बैठक में तय किया गया था कि सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री के लिए कृषि मंत्रालय द्वारा एक नेशनल फ्रेमवर्क तैयार किया जाएगा। उसके आधार किसानों को उर्वरकों की बिक्री की मात्रा और प्रक्रिया तय की जाएगी। लेकिन अभी तक यह फ्रेमवर्क सामने नहीं आया है। 

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