भारत-न्यूजीलैंड एफटीए: कृषि और डेयरी क्षेत्र के लिए सरकारी दावों में इतना अंतर क्यों?

भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (India-New Zealand FTA) व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं और राजनीतिक सतर्कता के बीच संतुलन बनाता है, विशेषकर कृषि और डेयरी क्षेत्रों में। न्यूजीलैंड को कोटा व्यवस्था और चरणबद्ध टैरिफ कटौती के माध्यम से सीमित बाजार पहुंच मिली है, जबकि भारत ने संवेदनशील डेयरी क्षेत्र की सुरक्षा बनाए रखते हुए कृषि निर्यात, मूल्यवर्धित उत्पादों और दीर्घकालिक सप्लाई चेन इंटीग्रेशन पर ध्यान केंद्रित किया है।

भारत-न्यूजीलैंड एफटीए: कृषि और डेयरी क्षेत्र के लिए सरकारी दावों में इतना अंतर क्यों?
भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (India-New Zealand FTA) को वेलिंगटन और नई दिल्ली में काफी राजनीतिक आशाओं के साथ प्रस्तुत किया गया। गहराई से देखने पर यह समझौता महत्वाकांक्षा और संयम के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन का परिणाम प्रतीत होता है, विशेष रूप से कृषि और डेयरी जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में, जहां आधिकारिक दावों के जोर, टोन और मूल अर्थ में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
 
न्यूजीलैंड सरकार के अनुसार, यह समझौता भारत में उसके वर्तमान निर्यात के लगभग 95 प्रतिशत हिस्से को रियायती पहुँच प्रदान करेगा। इसमें 57 प्रतिशत निर्यात पर तुरंत शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलेगा और समय के साथ यह हिस्सा बढ़कर 82 प्रतिशत तक पहुँचने की उम्मीद है। इस ढाँचे के भीतर वेलिंगटन ने कृषि व्यापार के संदर्भ में इसे ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें किसी भी भारतीय मुक्त व्यापार समझौते में पहली बार सेबों को रियायती पहुँच, कोटा सीमा के भीतर कीवीफ्रूट को शुल्क-मुक्त प्रवेश, और मनुका शहद पर शुल्क में भारी कटौती को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। इसके साथ ही समुद्री खाद्य पदार्थों, वाइन और बागवानी उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए चरणबद्ध उदारीकरण भी शामिल है। हालांकि, इन प्रावधानों का गहराई से अध्ययन यह संकेत देता है कि यह पहुँच न तो पूरी तरह व्यापक है और न ही तुरंत प्रभावी होगा। बल्कि इसे कोटा, लंबी संक्रमण अवधि और आंशिक शुल्क कटौती से गुजरना पड़ेगा। इससे व्यापक बाजार पहुँच के बड़े दावे की वास्तविकता कुछ कम हो जाती है।
 
न्यूजीलैंड द्वारा प्रतीकात्मक उपलब्धियों, जैसे कुछ विशेष श्रेणियों में दूसरे देशों की तुलना में पहले बाजार पहुंच सुनिश्चित करने पर दिया गया जोर केवल व्यावसायिक प्रभाव के लिए ही नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक संकेत देने के उद्देश्य से भी प्रतीत होता है। विशेषकर भारत के कृषि आयातों के प्रति ऐतिहासिक रूप से सतर्क रुख को देखते हुए। हालांकि यह समझौता उच्च-मूल्य वाले कृषि उत्पादों के लिए कुछ विशेष अवसर अवश्य खोलता है, लेकिन ये बेहद सावधानीपूर्वक सीमित और नियंत्रित रखे गए हैं, जिससे भारत की व्यापक कृषि अर्थव्यवस्था अचानक बाहरी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित बनी रहे।
 
न्यूजीलैंड के विपरीत, भारतीय वाणिज्य मंत्रालय लगभग उलट तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसके बयान में इस समझौते को न्यूजीलैंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे लेकिन खुले बाज़ार में भारत के कृषि निर्यात को बढ़ाने के साधन के रूप में देखा गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, न्यूजीलैंड को भारत का कृषि निर्यात वित्त वर्ष 2024 में 9.56 करोड़ डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 10.82 करोड़ डॉलर हो गया है। इस निर्यात के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर 5 प्रतिशत तक का शुल्क लगता था। मंत्रालय इस बात पर जोर देता है कि यह समझौता सभी टैरिफ श्रेणियों पर शुल्क समाप्त करता है, जिससे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, अनाज, मसाले, पेय पदार्थ और अर्ध-प्रसंस्कृत कृषि कच्चे माल सहित अनेक उत्पादों की मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
 
भारतीय पक्ष मूल्य-वर्धित क्षेत्रों पर विशेष जोर देता है, जिसमें कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों, एमएसएमई और क्षेत्रीय क्लस्टरों के लिए लाभ की संभावना जताई गई है। साथ ही, महिला उद्यमियों और ग्रामीण उत्पादकों को होने वाले संभावित लाभों को भी रेखांकित किया गया है। हालांकि टैरिफ में व्यापक कटौती के बावजूद यह तथ्य है कि न्यूजीलैंड का आयात बाजार का अपेक्षाकृत सीमित आकार है। उसका कृषि आयात लगभग 6.1 अरब डॉलर का है। इसका मतलब है कि प्रतिशत के रूप में बड़ी बढ़ोतरी होने पर भी भारत से निर्यात वास्तव में सीमित ही होगा। इस दृष्टि से यह समझौता भारत को व्यापक लेकिन सतही पहुंच प्रदान करता है, जबकि न्यूजीलैंड को कहीं बड़े उपभोक्ता आधार में अपेक्षाकृत सीमित लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रवेश मिलता है।
 
इस असमानता का सबसे स्पष्ट उदाहरण डेयरी क्षेत्र में दिखाई देता है, जिसे भारत की व्यापार वार्ताओं में लंबे समय से एक ‘रेड लाइन’ यानी अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता रहा है। डेयरी निर्यात में वैश्विक अग्रणी होने के बावजूद, न्यूजीलैंड इस समझौते के तहत भारत के मुख्य डेयरी बाजार में कोई महत्वपूर्ण पहुंच हासिल नहीं कर पाया है। इसके बजाय, रियायतें केवल सीमांत श्रेणियों तक सीमित हैं, जैसे शिशु आहार (इन्फेंट फॉर्मूला) और डेयरी-आधारित प्रिपरेशन, जहां शुल्कों को सात वर्षों में चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाएगा। इसके साथ एल्ब्यूमिन्स जैसे विशेष दुग्ध-प्रोटीन उत्पादों पर सीमित कोटा-आधारित शुल्क कटौती भी दी गई है।
 
और भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समझौते में एक “फास्ट-ट्रैक मैकेनिज्म” (त्वरित प्रक्रिया तंत्र) शामिल किया गया है, जिसके तहत न्यूजीलैंड के डेयरी अवयवों को आगे की मैन्युफैक्चरिंग और पुनः निर्यात के उद्देश्य से भारत में शुल्क-मुक्त प्रवेश की अनुमति होगी। इससे घरेलू उपभोक्ता बाजार के बजाय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक अप्रत्यक्ष प्रवेश मार्ग तैयार होगा। इसके अतिरिक्त, भारत ने इस बात पर सहमति जताई है कि यदि भविष्य के किसी समझौते में अन्य व्यापारिक साझेदारों को इसी प्रकार की डेयरी पहुंच दी जाती है, तो वह न्यूजीलैंड से परामर्श करेगा। यह प्रावधान तत्काल उदारीकरण का वचन दिए बिना संभावित लचीलेपन का संकेत देता है।
 
महत्वपूर्ण बात है कि भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के विस्तृत क्षेत्रीय आकलन में डेयरी क्षेत्र में किसी ठोस लाभ का उल्लेख नहीं किया गया है। यह अनुपस्थिति इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को रेखांकित करती है और इस निष्कर्ष को मजबूत करती है कि भारत ने वास्तव में अपनी संरक्षणवादी नीति को बनाए रखा है। ग्रामीण आजीविका और सहकारी संरचनाओं में डेयरी की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए इस क्षेत्र में किसी भी बड़े उदारीकरण के राजनीतिक परिणाम काफी व्यापक होते। यही वास्तविकता समझौते की रूपरेखा को प्रभावित करती हुई दिखाई देती है।
 
समग्र रूप से देखा जाए तो दोनों सरकारों के अलग-अलग बयान यह संकेत देते हैं कि यह समझौता उतना परिवर्तनकारी नहीं है, जितना प्रारंभिक प्रस्तुति में दिखाई देता है। इसके बजाय, यह क्रमिक भागीदारी के लिए सावधानीपूर्वक तैयार किया गया संतुलित ढांचा है। जहाँ न्यूजीलैंड ने चुनिंदा कृषि श्रेणियों में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित की है और भविष्य में संभावित लाभ के लिए स्वयं को तैयार किया है, वहीं भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि उसके सबसे संवेदनशील क्षेत्र सुरक्षित रहें, साथ ही कम विवादास्पद क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाने के लिए इस समझौते का उपयोग भी किया है।
 
दोनों सरकारें इस समझौते को मजबूत सप्लाई चेन इंटीग्रेशन के मंच के रूप में प्रस्तुत करने पर सहमत दिखती हैं। न्यूजीलैंड खाद्य प्रसंस्करण और कच्ची सामग्री की आपूर्ति में अवसरों को रेखांकित कर रहा है, जबकि भारत घरेलू नीतिगत पहलों से समर्थित मूल्यवर्धित निर्यात के विस्तार की ओर संकेत कर रहा है। यह बताता है कि एफटीए का वास्तविक प्रभाव तात्कालिक व्यापार वृद्धि में नहीं, बल्कि प्रोडक्शन लिंकेज और मध्यवर्ती वस्तुओं के प्रवाह के धीरे-धीरे विकसित होने में निहित हो सकता है।
 
अंततः भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता व्यापार में उदारीकरण की संभावनाओं जितना ही राजनीतिक अर्थव्यवस्था की सीमाओं को भी दर्शाता है। यह समझौता दोनों पक्षों को सफलता का दावा करने के लिए पर्याप्त अवसर देता है, लेकिन उन संरचनात्मक बदलावों से अभी दूर है जो वास्तव में किसी व्यापक समझौते की पहचान होते हैं। सावधानीपूर्वक तय किए गए ये प्रावधान वास्तव में व्यावसायिक स्तर पर कितना रूपांतरित होंगे, यह इस बात पर अधिक निर्भर करेगा कि बिजनेस जगत इस समझौते में निहित सीमित लेकिन रणनीतिक अवसरों का किस प्रकार उपयोग करता है।

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