एग्री बिजनेस से गांवों का विकासः चुनौतियां और उनका समाधान

एग्री बिजनेस की पहल ग्रामीण क्षेत्र को प्रभावित करने वाले सभी मुद्दों के हल के लिए एक रामबाण प्रतीत होती है। ग्रामीण क्षेत्र में विकास लोगों के हित में होना चाहिए। गांव से गन्ना गुड़ के रूप में बाहर निकलेगा या शक्कर के रूप में, आलू निकलेगा या आलू के चिप्स। इसी तरह गांव गेहूं के बजाय आटे की पैकिंग और टमाटर की जगह टमाटर सूप की सप्लाई कर सकते हैं। इसे संभव बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है

एग्री बिजनेस से गांवों का विकासः चुनौतियां और उनका समाधान

पिछले दिनों किसान दिवस (23 दिसंबर) के मौके पर रूरल वॉयस ने ‘एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नेडाक अवार्ड्स 2021’ का आयोजन किया। उस कार्यक्रम में कई नीति निर्माताओं, वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञों और पत्रकारों ने भाग लिया। अन्य विषयों के अलावा कार्यक्रम में इस बात की भी चर्चा हुई कि कृषि को किस तरह कृषि व्यवसाय (एग्री बिजनेस) बनाया जाए, जो आज की जरूरत है। जिन किसानों को खेतों में होना चाहिए, वे पिछले दिनों सड़कों पर थे। सरकार से उनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी थी कि खेती में इस्तेमाल होने वाले इनपुट और उनकी उपज की कीमतों के मामले में उनके साथ उचित बर्ताव नहीं होता है, भले ही उन्हें 2.2 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी मिलती हो। यह सब्सिडी उर्वरक, बिजली, फसल बीमा, बीज, कर्ज, सिंचाई जैसे मदों में होती है। यह कृषि जीडीपी का 10 फीसदी और औसत कृषि आय का 12 फीसदी है। आखिर ऐसा क्यों है? 

इसका कारण यह है कि कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की तुलना में धीमी प्रगति कर रहा है। इस पर क्षमता से अधिक लोगों का बोझ है। यह बात इस तथ्य से जाहिर होती है कि 1951-52 से लेकर 2016-17 तक साढ़े छह दशक तक उद्योग जगत की सालाना वृद्धि दर छह फीसदी से अधिक रही। सेवा क्षेत्र ने भी छह फीसदी से अधिक की दर से विस्तार किया। लेकिन कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर तीन फीसदी से भी कम थी। इसका नतीजा जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी घटने के रूप में सामने आया। 1950-51 में जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 53.1 फीसदी थी जो 2016-17 में सिर्फ 15.2 फीसदी रह गई। हालांकि अगर विकसित देशों से तुलना करें तो दक्षिण कोरिया की जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी दो फीसदी, फ्रांस में 1.5 फीसदी, जापान और अमेरिका में एक फीसदी और इंग्लैंड में सिर्फ 0.5 फीसदी है। उन देशों में कृषि क्षेत्र में रोजगार एक से पांच फीसदी के बीच है जबकि भारत में यह 45 फीसदी है।

आज भारत में कृषि विकास का नहीं बल्कि संकट का प्रतिबिंब बन गई है। इस बदलाव का मुख्य कारण किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य ना मिलना और भीषण बेरोजगारी है। यदि किसानों को खेती से अधिक कमाई हो और उन्हें अपने इर्द-गिर्द ही अतिरिक्त कार्य के अवसर मिलें तो वे बेहतर स्थिति में होंगे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कृषि को एग्री बिजनेस में बदलने की चर्चा हो रही है और विभिन्न क्षेत्रों से इस बहस को समर्थन भी मिल रहा है।

एग्री बिजनेस का अर्थ

कृषि व्यवसाय में चार क्षेत्र हैं, (1) कृषि इनपुट (2) कृषि उत्पादन (3) प्रोसेसिंग और (4) मार्केटिंग तथा ट्रेड। अगर इन चारों को हम मिला कर देखें तो फसल उत्पादन, वितरण, कृषि रसायन, चारा, ब्रीडिंग, कृषि उपकरण, बीज वितरण, कच्ची और प्रोसेस्ड कमोडिटी, भंडारण, ट्रांसपोर्टेशन, पैकिंग, मृदा परीक्षण, मार्केटिंग, रिटेल बिक्री आदि सब इसमें आ जाते हैं।

कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने में सरकार के प्रयास 

किसानों की आमदनी बढ़ाने के मकसद से देश में एग्री बिजनेस को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए आईसीएआर ने नेशनल एग्रीकल्चर इनोवेशन फंड (एनएआईएफ) के तहत देश के अलग-अलग राज्यों में एग्री बिजनेस इनक्यूबेशन (एबीआई) केंद्रों का नेटवर्क तैयार किया है। ये एबीआई केंद्र टिकाऊ बिजनेस के प्रयासों को आगे बढ़ाने और टेक्नो-आत्रप्रेन्योर को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन केंद्रों में अनुसंधान में मदद, बिजनेस प्लानिंग, ऑफिस की जगह, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी तक पहुंच जैसी अनेक तरह की सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके अलावा यहां प्रबंधन, मार्केटिंग, तकनीकी, कानूनी और वित्तीय मामलों में उद्यमियों को सलाह भी दी जाती है।

एग्री बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए 12वीं योजना में कृषि में युवाओं को आकर्षित करने एवं बरकरार रखने (अट्रैक्टिंग एंड रिटेनिंग यूथ इन एग्रीकल्चर- आर्य) की योजना की शुरुआत की गई थी। इसे हर राज्य के एक जिले में किसान विकास केंद्र (केवीके) के जरिए लागू किया जाता है। कार्य की प्रकृति के आधार पर इसके तहत व्यक्तिगत या समूह आधारित गतिविधियों/उद्यमों को प्रोत्साहित किया जाता है। ग्रामीण उद्यमिता जागरूकता विकास योजना (रूरल आंत्रप्रेन्योरशिप अवेयरनेस डेवलपमेंट योजना- रेडी) की शुरुआत 2015-16 में हुई थी। रेडी में प्रायोगिक शिक्षा, ग्रामीण जागरूकता, कार्य का अनुभव, प्लांट प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़े अन्य प्रशिक्षण जैसे कार्य किए जाते हैं। हर छात्र को छह महीने तक वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। नियमित थोक बाजारों के नेटवर्क के जरिए कृषि मार्केटिंग की जाती है। इनका गठन राज्य कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) एक्ट के तहत किया गया है। सरकार ने राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) लागू किया है। यह एक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है जहां किसानों को प्रतिस्पर्धी ऑनलाइन नीलामी व्यवस्था के तहत अपनी उपज की उचित और लाभकारी कीमत तय करने का अवसर मिलता है।

चुनौतियां

सरकार ने देश में एग्रीबिजनेस को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय किए हैं, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने में कई चुनौतियां हैं। किसानों के विकास के लिए अभी तक जो प्रयास किए गए हैं उनका सर्वाधिक लाभ उठाने के लिए आगे बताए अतिरिक्त नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं। पहला, किसानों को निरंतर इन पहलुओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। पीआरआई और उनके चेयरपर्सन तथा सदस्य इस कार्य में शामिल किए जा सकते हैं। दूसरा, विभिन्न कार्यक्रमों के बीच समयबद्ध तरीके से प्रभावी सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए। अन्य कार्यक्रमों के अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं और एग्री बिजनेस गतिविधियों में इनका पूरा लाभ उठाया जाना चाहिए। तीसरा, जमीनी स्तर पर सेवाओं की डिलीवरी मजबूत की जानी चाहिए। इसमें प्रशिक्षित लोगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर खाली पड़े विभिन्न पदों को तत्काल भरे जाने की जरूरत है। चौथा, कृषि से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में बैंक किसी सरकारी कार्यालय की तरह नहीं बल्कि दोस्त, फिलॉस्फर और गाइड बनकर किसानों के साथ काम करें। राजनीतिक दलों को कर्ज माफी की घोषणाओं से बचना चाहिए क्योंकि यह न तो अच्छी राजनीति है और ना ही अच्छा अर्थशास्त्र।

एग्री बिजनेस की पहल ग्रामीण क्षेत्र को प्रभावित करने वाले सभी मुद्दों के हल के लिए एक रामबाण प्रतीत होती है। ग्रामीण क्षेत्र में विकास लोगों के हित में होना चाहिए। गांव से गन्ना गुड़ के रूप में बाहर निकलेगा या शक्कर के रूप में, आलू निकलेगा या आलू के चिप्स। इसी तरह गांव गेहूं के बजाय आटे की पैकिंग और टमाटर की जगह टमाटर सूप की सप्लाई कर सकते हैं। इसे संभव बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बशर्ते केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर प्रभावी नेतृत्व हो।

(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के अधिकारी रह चुके हैं, अभी कृपा फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं)