डब्ल्यूटीओ के नाम पर और चीनी उद्योग की लाबिंग गन्ना मूल्य नीति को बदलने का दबाव

डब्ल्यूटीओ के नाम पर और चीनी उद्योग की लाबिंग गन्ना मूल्य नीति को बदलने का दबाव

चीनी उद्योग और सरकार के बीच बेहतर जुगलबंदी चल रही है। कृषि सुधारों के दौर में एक और बड़े बदलाव की दिशा में बढ़ने तैयारी हो रही है यह है गन्ना मूल्य निर्धारण के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों की नीति में बदलाव की। देश की निजी चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) की 19 दिसंबर 2020 को हुई सालाना बैठक में इसके अध्यक्ष द्वारा कही गयी बातों में इसकी झलक दिखती है। जहां इस्मा अध्यक्ष का सबसे अधिक जोर इस बात पर था कि देश में गन्ना मूल्य निर्धारण का फार्मूला बदलने  वक्त आ गया है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा तय किया जाने वाला गन्ना मूल्य काफी अधिक है। प्रतिस्पर्धी दुनिया में दूसरे देशों की चीनी मिलों के मुकाबले भारत की चीनी मिलें 50 फीसदी तक अधिक गन्ना मूल्य भुगतान करती हैं। जबकि रंगराजन समिति समिति और रमेश चंद समिति इसे चीनी के बिक्री मूल्य के 70 से 75 फीसदी पर निर्धारित करने की सिफारिश कर चुकी हैं।

असल में इस मसले पर देश में सबसे अधिक चीनी उत्पादन करने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार परोक्ष रूप  से अमल भी कर रही है। कई दशकों तक गन्ने के केंद्र सरकार द्वारा तय किये जाने वाले गन्ने के स्टेचुरी मिनिमम प्राइस (एसएमपी) जिसे पर बदल कर फेयर एंड रिम्यूनिरेटिव प्राइस (एफआरपी) कर दिया गया है के मुकाबले उत्तर प्रदेश समेत कई दूसरे राज्यों द्वारा स्टेट एडवाइज्ड प्राइस (एसएपी) के बीच दस से 20 फीसदी तक का अंतर रहा है। लेकिन उद्योग के दबाव में उत्तर प्रदेश की मौजूदा भाजपा सरकार और इसके पहले वाली अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल वाली समाजवादी पार्टी सरकार  एसएपी और एफआरपी के अंतर को पाटने में अहम भूमिका निभाई है। पिछले सात साल में उत्तर प्रदेश में गन्ने के एसएपी में केवल 35 रुपये प्रति क्विंटल ही इजाफा हुआ है। जबकि इस दौरान एफआरपी में कुल बढ़ोतरी इससे कहीं अधिक है। साल 2012 में सत्ता में आई अखिलेश यादव सरकार ने पहले साल और अंतिम साल में ही गन्ना के एसएपी में बढ़ोतरी की। वहीं मौजूदा भाजपा सरकार ने केवल पहले साल ही दस रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की। इस तरह  से 2013 से 2020 तक हुई दो बार की बढ़ोतरी केवल 35 रुपये प्रति क्विटंल ही रही है। चालू पेराई सीजन को करीब दो माह हो चुके हैं और राज्य सरकार ने अभी तक एसएपी निर्धारण का कोई फैसला नहीं लिया है।

वैधानिक रूप से गन्ने की आपूर्ति के 14 दिन के भीतर किसानों को भुगतान हो जाना चाहिए लेकिन अभी तो चालू पेराई सीजन (अक्तूबर 2020 से सितंबर 2021) के लिए एसएपी ही तय नहीं हुआ है तो भुगतान कैसे हो। हालांकि कुछ चीनी मिलों ने पिछले साल की कीमत  325 रुपये प्रति क्विटंल के आधार पर आंशिक भुगतान शुरू किया है लेकिन यह कुछ चुनिंदा मिलों ने ही किया है। हो सकता है कि देशभर में चल रहे किसान आंदोलन के दबाव में उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार एसएपी में कुछ बढ़ोतरी कर दे। हरियाणा ने हाल ही में बढ़ोतरी कर गन्ने के एसएपी को 350 रुपये प्रति क्विटंल कर दिया है।

अहम बात यह है कि मौजूदा एफआरपी पर 10 फीसदी रिकवरी के बाद मिलने वाले बोनस को जोड़ दें तो अब उत्तर प्रदेश के एसएपी और केंद्र द्वारा तय एफआरपी में कोई अंतर नहीं रह जाता है। दूसरी ओर चीनी मिलों का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एसएमपी) के लिए अपनाये गये फार्मूले ए2 प्लस एफएल के आधार पर गणना करने पर गन्ने का एफआरपी ए2प्लस एफएल से 100 फीसदी ज्यादा है। जबकि अन्य फसलो में यह अधिकतम 70 फीसदी तक ही है। इस तरह से गन्ना किसानों को सबसे बेहतर दाम मिल रहा है। एक तरह से चीनी मिलें गन्ने के मूल्य में बढ़ोतरी के खिलाफ अपने पक्ष को मजबूत कर रही हैं। वहीं अप्रैल 2004  में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ द्वारा राज्य सरकारों को एसएपी निर्धारण का अधिकार देने के फैसले को सात सदस्यीय पीठ में ले जाने का मामला भी चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट में उठा रही हैं और इस पर सुनवाई चल रही है।

इस तरह से देखा जाए तो चीनी मिलों का लक्ष्य गन्ना मूल्य को चीनी की कीमत से जोड़ने के फार्मूले पर केंद्र सरकार को तैयार करने पर है। इसके साथ ही इस मामले में अब डब्ल्यूटीओ के विवाद निस्तारण पैनल में भारत के खिलाफ चल रहे केस से भी जोड़ा जा रहा है। वहां पर चीनी के निर्यात पर केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी और गन्ना मूल्य के लिए सरकार के कदमों को वैश्विक व्यापार के मानदंडों के खिलाफ बताया जा गया है। भारत  खिलाफ तीन याचिकाओं पर जांच चल रही है। जिनमें ब्राजील, थाइलैंड, आस्ट्रेलिया के साथ ही करीब दर्जन भर अन्य देश शामिल हैं। वैसे सरकार ने पिछले सीजन में 60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए 10.42 रुपये प्रति किलो की निर्यात सब्सिडी दी थी जिसके आधार पर करीब 58 लाख टन चीनी का निर्यात हुआ जो अभी तक रिकार्ड है। चालू पेराई सीजन में भी 60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए छह रुपये किलो की सब्सिडी देने का फैसला सरकार ने हाल ही में लिया है जिस पर 3500 करोड़ रुपये चीनी मिलों को मिलेंगे।

इस फैसले की घोषणा करते हुए सरकार ने कहा है कि सब्सिडी का यह पैसा सीधे किसानों के खाते में जाएगा। जिसका कोई आधार नहीं है क्योंकि यह पैसा चीनी मिलों को ही निर्यात के लिए तय शर्तें पूरी होने के बाद मिलता है। जिसमें पिछले सीजन के निर्यात की पूरी सब्सिडी चीनी मिलों को अभी तक नहीं मिली है। इसलिए सरकार तय बयान बेबुनियाद है। हालांकि तमाम चीनी मिलें अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। यह सब गन्ना किसानों को भुगतान करने के नाम पर ही होता है। महाराष्ट्र  में अधिकांश चीनी मिलों ने एफआरपी के आधार पर लगभग पूरा भुगतान कर दिया है। लेकिन चीनी के सबसे बड़े उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश  में 11 दिसंबर तक चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का पिछले सीजन (2019-20) का 3673.92 करोड़ रुपये  का बकाया था। उसके बाद के आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किये गये हैं। वहीं चालू पेराई सीजन का करीब एकतिहाई सीजन भी बीत गया है लेकिन अभी तक जब दाम ही तय नहीं है तो बकाया की गणना नहीं हो रही है। उपलब्ध आंकडों के अनुसार 11 दिसंबर तक 178.86 लाख टन गन्ने की पेराई हुई थी पिछले साल के एसएपी के आधार पर ही इसका मूल्य 5800 करोड़ रुपये बनता है। इस तरह से राज्य में गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर बकाया दस हजार के आसपास पहुंच है। इस सबके बीच सरकार रिकार्ड भुगतान के दावे कर रही है जबकि हकीकत कुछ ओर ही है। वहीं चीनी मिलों की गन्ना मूल्य का फार्मूला बदलवाने की रणनीति भी अगर कामयाब हो जाए तो उस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसकी वजह अभी भी गन्ना किसानों का अपने हक के लिए मजबूती से मुखर नहीं होना है. भले ही किसान केंद्र सरकार द्वारा लाये गये तीन कृषि संबंधी कानूनो को लेकर देशव्यापी आंदोलन चला रहे है लेकिन उत्तर प्रदेश के मामले में अभी भी गन्ना मूल्य का निर्धारण और उसका भुगतान ही सबसे बड़ा मुद्दा है। हो सकता है कि मौजूदा आंदोलन के साथ यह मुद्दा भी बड़ा बनकर उभरे।